मंगलवार, 16 जुलाई 2013

आपदा के जख्म

इन शानदार वादियों में गूंजा करते थे कभी
देवालयों के शंख, घंटियों के स्वर,
मंजीरों की तान
और भक्तों के जैकरा ....i
आज हवा भी चलती है तो लगता है
जैसे कफन उडा के लायीं है
दूर तक दृष्टीगोचर होता है
मौत का है जैसे सन्नाटा पसरा ....i
शांत सुन्दर सरिताओं
के कलकल निनाद करते
संगीतमय सजीले स्वरों
की तान ने
आज बदला है रूप ....
उनकी भयानक, विभत्स
और गुर्राती दहाड़
रूह को कंपकपा देती है ....
अनगिनित बहती
लाशों को आज तट पर
वह उगल रही है…
मंजर देख हिरदय
के किसी कोने में असहनीय
टीस सी उठती है…
और एक आवाज आती है
कि जिसे हम माँ कहते थे
उसी ने आज अपने बच्चों को
निगल लिया है…
उन पहाड़ों के शानदार
नीले नीले रंग
अब स्याह हो गए हैं ...
उनमे उड़ते बादलों
को निहार कर
आज लागता है
जैसे फिर मौत का
पैगाम लाये हैं ....
दर्द और अब न देना
हे देव भूमि के देवो
भूमि पुत्रो ने तुम्हें
सदैव मान सम्मान
और हिरदय से पूजा है....
यदि सजा ही देनी है
तो उनको दो जिन्होंने
तेरी धारा को मोड़ा है…
तेरी छाती में बैठ कर
सुतक (अपवित्र ) कर
तेरी पवित्र धरती को लूटा है
पावन देवभूमि को लूटा है

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