रविवार, 21 जुलाई 2013

हम मांसाहारी नहीं हैं


हम मांसाहारी नहीं हैं 

हाँ भाई, हम मांसाहारी नहीं हैं, मुर्गा नहीं चबा पाते हैं.
लाशों को गटककर पेट कब्रिस्तान नहीं बना पाते हैं.
कभी जिन के साथ खेले थे, जिनको यार कहा कभी,
उन बेजुबा जानवरों को हँसते हँसते नहीं पचा पाते हैं.

मन भटक भी जाएँ अगर कभी, तो उसके चहकते भागते
बच्चों का सोच जाते हैं,
फिर छुर्री क्या, उसपे नज़र भी नहीं उठा पाते हैं.
हाँ भाई , हम मांसाहारी नहीं हैं, मुर्गा नहीं चबा पाते हैं.
चंद सिक्कों की खातिर, किसी का खून नहीं बहा पाते हैं.

आप महंगाई की बात कर रहे जनाब, ज़रा मैन्यू उठाइए, एक
टँगड़ी कबाब के पैसो में, दो जने भरपेट पनीर खा जाते हैं.
बाकी अब इसे देश का दुर्भाग्य कहूँ या उन
चूज़ो का कि एक अंडे की कीमत में मूट्ठी भर मटर नहीं आ
पाते हैं,

अब क्या करें, ये संस्कार हैं मिले हमें, भूखे रह जाएँ भले,
जिंदगी शुरू होने से पहले ही उन्हे मौत की नींद
नहीं सुला पाते हैं.
हाँ भाई, हम मांसाहारी नहीं हैं, मुर्गा नहीं चबा पाते हैं.
अपने पेट के वास्ते, किसी और का पेट नहीं कटा पाते हैं.

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