शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

गावँ से शहर

गावँ से शहर 


नदिया के तीरे ,पर्वत की छाँव,
घाटी के आँचल मे मेरा वो गाँव,
बस्ती वहां एक भोली भाली,
उसमे घर एक ख़ाली ख़ाली,
बचपन बीता नदी किनारे,
पेड़ों के नीचे खेले खिलौने,
कुछ पेड़ कटे ,कुछ नदियाँ सूखी,
विकास की गति वहां न पंहुंची।
  
छूट चला इस गाँव से नाता,
         धुंए शोर मे घिर गई काया,
         लोग शहर के बड़े अलबेले,
         गमलों मे पेड़ो को लगायें,
         बौने पेड़ बौन्साई कहलायें,
          पर्वत से गिरते झरनों को,
घर मे लाकर वो सजायें,
         पशु पक्षी पलें पिजरों मे,
          इतवार को चिड़िया घर जायें।
बिनसर



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