बुधवार, 17 जुलाई 2013

अपरिचित पहाड़ी

अपरचित पहाड़ी की कविता की दो लाइन

ना मै कोई लेखक हूँ
ना ही मै कोई कवि ....
अन्पड भोला गाव का
पहाड़ी है मेरी छवि....

पहाड़ों में रहकर मेरी
आदत है बहुत ही भोली...
सीधा साधा पहनावा मेरा
पहाड़ी है मेरी बोली .....

नौले धारे का पानी
पीता हूँ हर रोज
मडुवे और मक्के की रोटी खाकर
मिलाता है मुझको जोश

हिस्यालू किलमाडु फल खाकर
मिले मुझे एक नै उर्जा
सेब, पपीता देशी फल
इनके सामने जायेंगे मुर्झा

गुल्ली दंडदा अड़डु पीडडु
मेरे मन पसंदीदा खेल
ना इनमे राजनीति और फिक्सिंग का डर
इनसे होती केवल मेल ही मेल

खेत गाय भैस भेड़ बकरी मेरी
मुझको हैं सबसे प्यारे
सीडी नुमा खेत मेरे
सारे जग से हैं न्यारे

इष्ट, एडी,भूमिया, गंगनाथ, देवी
सैम और भी मेरे हैं पूज्य देव
जिनकी छत्र छाया में
हमेशा रहता हूँ में सेव

मेरा पहाड़ मेरा स्वर्ग हैं
बस्ती हैं यहाँ मेरी जान
ठंडा पानी मीठी वाणी
यही है मेरी पहचान

चौतीस करोड़ देवी देवता
निवास करते हैं जिसके खंड- खंड
नमन करता हूँ अपनी मात्रभूमि को
जय पहाड़ जय देव भूमि जय उत्तराखंड

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