पहाड़
पर आने वाली प्रकृतिक आपदा का आभास कुमाउ के जाने माने कवि, गीतकार एवम्
लोक गायक स्व. गिरीश चन्द्र तिवारी "गिर्दा"जी को सायद आज से बहुत साल
पहले ही हो गया था तभी तो उनके मन से ये उद्दगार निकले :-
सारा पानी चूस रहे हो,
नदी समन्दर लूट रहे हो,
गंगा जमुना की छाती पर,
कंकर पत्थर कूट रहे हो।
उफ्फ! तुम्हारी ये खुदगर्जी,
चलेगी कब तक ये मनमर्जी,
जिस दिन डोलेगी ये धारती,
सिर से निकलेगी ये मस्ती।
महल चौबारे बह जायेंगे,
खाली रौखड़ रह जायंगे,
बूंद बूंद को तरसंगे हम,
बोल व्योपारी तब क्या होगा?
नकद-उधारी तब क्या होगा?
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