बुधवार, 17 जुलाई 2013

अभिनन्दन

अभिन्दन

शिखरों पर फैलती प्रकाश
करता भोर का अभिनन्दन
बन-उपबन में भेद तम को
प्राण फूंकती प्रभाती किरण
रात्री का ब्याकुल अकुलाता छण
तब करता शुभ प्रभात का
अभिनन्दन ........................ !

खग के, कल कल करते कलरब
देबाल्यो से आते प्रभाती स्वर
ब्योम पर तैरती सिंदूरी रंग
देती नव सुबहो को आमंत्रण !

सरिता बहती अल्हड नव युवगना सी
मेरु हर्षित होते बाल पुलकित सी
बेग उन्मत होकर करती आलिंगन
उस सृष्ठी की पहली पहर का ...
धरती करती तिलक उस पवित्र पल का !

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