बुधवार, 17 जुलाई 2013

नेपाली युवक

मेट ( डोटियाल ) ...

...नेपाल के इन शख्सों ने उत्तराखंड में अपनी मेहनत का लोहा मनवाया और आज सारे गाँवों में ये छा गए हैं ...खासकर जो काम किसी के बस में नहीं रहा वहाँ इनकी मांग है ...कोई भी कार्यक्रम हो उनमें इनकी सेवा अहम् होती है ...

....शुरू शुरू में ये शहरों तक सीमित थे और लालाओं की दुकान में काम करते ...बड़े से बड़े बोरे और भारी भरकम सामान ले जाना इन्हीं के बस का था ....बाद में इन्होने कुली और फेरी का काम भी अपना लिया ...प्यार से ' हुजूर ' या ' शाब ' कहके तनिक ज्यादा मांग लेना कोई इनसे सीखे ...कई मेट एक साथ एक कमरे में रहकर और फिर एक साथ नेपाल जाकर अपने सौहार्दता का परिचय देते रहे हैं ....इन्हें बेवकूफ बनाना भी इतना आसान नहीं होता जितना कभी - कभार हम बन जाते हैं ....

....इस तथ्य के अलावा मुझे कुछ साल पहले गाँव में तब हैरानी हुई जब हमारे गाँव में ही डेरा डाले मेट को मैंने बेटे के उपनयन संस्कार पर काम के लिए बुलाया ....काम निपट जाने के बाद मैंने जब उसके बारे में जानकारी ली तो उसने बताया कि उसके तीन बेटे नेपाल में अच्छी नौकरियों में हैं ....वह चाहता तो आराम से घर रह सकता था लेकिन वो खुदगर्जी नहीं छोड़ना चाहता और साल में कई बार घर जाता रहता है ... उसके बाद उससे कुछ गीत सुनाने को कहा तो उसने ढोलक को अपने नए अंदाज में बजाते हुए भजनों के जरिये ऐसा समा बांधा कि हम , घर में आये मेहमान ही नहीं बल्कि आस पड़ोस के लोग भी इकट्ठा हो गए ....उसने जो भजन सुनाये वे सब धार्मिक कथाओं और रामायण के अनूठे प्रसंगों पर आधारित थे ...उसकी आवाज में जादू था और एक लय थी ....फिर उससे नेपाल के इतिहास , और रामायण पर चर्चा हुई तो मैं हैरान था कि उसे काफी जानकारी हासिल थी ...हमने उसका गीत रिकार्ड किया और उसके साथ फोटो खिंचाये ...मैं वाकई अभिभूत था ....

.....इससे पहले मुझे दिल्ली में मेरी कालोनी के चौकीदार नेपाल के जोशी जी मिले थे जो मेरी तरह 6 पल्ली जनेउ पहनते थे और मुझसे अधिक स्नान धर्म कर्म में रहते ...मुझे साहब जरूर कहते थे लेकिन उनकी विनम्रता और जानकारी के लिहाज से मैं उन्हें अदब से जोशी जी कहकर पुकारता .....

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें