पेट की आग धकेलती है
गांव की अमराई से बाहर
खेतों की हरियाली से परे
कंकरीट के जंगलों में
हर उस दोपाये को
जिसके मन में आस होती है
झोंपडी को घर बनाने की
जमीन से उठ चारपाई तक आने की
बच्चों को मजदूरी से पढाई तक लाने की
और इसी दिन का नया सूरज
देखने की चाह
भटकाती है उसको
तारकोल और कंक्रीट से बने रास्तों पर
जिन पर चलते चलते
वह भूल जाता है
उन कच्ची नन्हीं-तंग पगडंडियों को
जो उसके कच्चे घर तक जाती हैं
गांव क्या और कैसा होता है ?
अगली पीढी बतियाती है
कच्चे घर भरभर्रा जाते हैं
गांव की पगडंडी एक आस की भेंट चढ
शहर तक पहुंचते पहुंचते
बीच ही में कहीं खो जाती है.
मोहिन्दर कुमार
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