बुधवार, 17 जुलाई 2013

बल्ली सिंह चीमा

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के,
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कह रही रही है झोंपड़ी और पूछते हैं खेत भी,
कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के,

बिन लड़े कुछ भी यहाँ मिलता नहीं ये जानकर,
अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के,
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कफन बंधे हैं सरों पर हाथ में तलवार है,
ढूंढने निकले हैं दुश्मन लोग मेरे गाँव के,
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एकता से बल मिला है झोंपड़ी की साँस को,
आँधियों से लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के,
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हर रूकावट चीखती है ठोकरों की मार से,
बेड़ियाँ खनका रहे हैं लोग मेरे गाँव के,
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दे रहे हैं देख लो अब वो सदा-ऐ-इंक़लाब,
हाथ में परचम लिए हैं लोग मेरे गाँव के,
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देख लो अब जो सुबह दिखती है फीकी आजकल,
लाल रंग उसमें भरेंगे लोग मेरे गाँव के......

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