शनिवार, 12 जुलाई 2014

जरूर पढ़ें


बादाम खाने से उतनी अक्ल नहीं आती...
जितनी
धोखा खाने से  आती है.....!
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आप का खुश रहना  ही
आप का बुरा चाहने वालों के लिए सबसे बड़ी सजा है....!
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खुबसूरत लोग हमेशा अच्छे नहीं होते,
अच्छे लोग हमेशा खूबसूरत नहीं होते !
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रिश्ते और रास्ते एक ही सिक्के के दो पहलु हैं
कभी रिश्ते निभाते निभाते रास्ते खो जाते हैं
और कभी रास्तो पर चलते चलते रिश्ते बन जाते हैं
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बेहतरीन इंसान अपनी मीठी जुबान से ही जाना जाता है
वरना
अच्छी बातें तो दीवारों पर भी लिखी होती है *************************
इस कलयुग में रूपया  चाहे
कितना  भी  गिर  जाए, इतना कभी नहीं गिर पायेगा,
जितना रूपये  के  लिए  इंसान  गिर चुका है *************************
रास्ते में अगर मंदिर देखो तो प्रार्थना नहीं करो  तो चलेगा
पर
रास्ते में एम्बुलेंस मिले तब प्रार्थना जरूर करना शायद कोई जिन्दगी बच जाये
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जिसके पास उम्मीद हैं,
वह लाख बार हार के भी,
नही हार सकता !
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दुनिया में कोई काम " impossible" नहीं
बस होसला और मेहनत की जरूरत  है
"Impossible" को गौर से देखो वो खुद कहता है
      I   m   possible
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सहमत हों तो शेयर जरूर करें।

शनिवार, 5 जुलाई 2014

पगडण्डी

पेट की आग धकेलती है
गांव की अमराई से बाहर
खेतों की हरियाली से परे
कंकरीट के जंगलों में
हर उस दोपाये को
जिसके मन में आस होती है
झोंपडी को घर बनाने की
जमीन से उठ चारपाई तक आने की
बच्चों को मजदूरी से पढाई तक लाने की
और इसी दिन का नया सूरज
देखने की चाह
भटकाती है उसको
तारकोल और कंक्रीट से बने रास्तों पर
जिन पर चलते चलते
वह भूल जाता है
उन कच्ची नन्हीं-तंग पगडंडियों को
जो उसके कच्चे घर तक जाती हैं
गांव क्या और कैसा होता है ?
अगली पीढी बतियाती है
कच्चे घर भरभर्रा जाते हैं
गांव की पगडंडी एक आस की भेंट चढ
शहर तक पहुंचते पहुंचते
बीच ही में कहीं खो जाती है.

मोहिन्दर कुमार

उत्तरायणी मेला बागेश्वर

उत्तरायणी मेला बागेश्वर:-
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देवभूमि उत्तराखण्ड में उत्तरायणी मेले का धार्मिक
व्यापारिक और सांस्कृतिक महत्व है। उत्तराखण्ड के
प्रयाग कहे जाने वाले बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर
लगने वाला यह मेला मकर संक्रांति से आरंभ होकर लगभग
हफ्ते भर चलता है। यह व्यापारिक मंडी के रूप में भी
जाना जाता है जिसमें धार्मिक से लेकर सांस्कृतिक
कार्यों से जुड़े और राजनीतिक लोग भी शिरकत करते
हैंशैलराज हिमालय की सुरम्य क्रीड़ांगना
में विशालकाय नीलेश्वर व भीलेश्वर की पर्वत कंदराओं
के मध्य सूर्यकुंड से अग्निकुंड तक विस्तार लिये हुए
कटोरानुमा ऐतिहासिक नगरी बागेश्वर माद्घ मास
की पहली तिथि से अपार जनसमूह वाले
उत्तरायणी मेले का रूप ले लेती है।
आयोजन की दृष्टि से सूर्य के उत्तरी अमन में प्रवेश के
पहले दिन उत्तरायण माद्घ मास की पहली तिथि से
पांच दिनों तक मेला लगता है। परंतु पवित्रतम माद्घ
मास भर यहां स्नान पर्व आयोजित होते रहते हैं।
सरयू, गोमती और विलुप्त जलधारा सरस्वती के
त्रिवणी संगम के कारण बागेश्वर को उत्तराखण्ड
का प्रयाग भी कहा जाता है। बागेश्वर नगर समुद्र सतह
से 760 मीटर की सतही ऊंचाई पर स्थित है और
प्राचीनकाल से ही
ऐतिहासिकता, धार्मिकता और सांस्कृतिक वैभव के
लिये प्रसिद्ध रहा है।
बागेश्वर को मार्कण्डेय
मुनि की तपोभूमि भी कहा जाता है।

मेरा गाँव

गौर से देखो इसे और प्यार से निहार लो
आराम से बैठो यहाँ पल दो पल गुजार लो
सुध जरा ले लो यहाँ पर एक हरे से घाव की
कि यह जमीं है गाँव की, हाँ ये जमीं है गाँव की..

कुल कुनबा और कुटुम का अर्थ बेमानी हुआ
ताऊ चाचा खो गये सब, खो गई बड़की बुआ
गाँव भर रिश्तों की कैसी डोर में ही था बँधा
जातियों का भेद रिश्तों की तराजू था सधा
याद है अब तक धारे नौले और उनके छाँव की
कि यह जमीं है गाँव की, हाँ ये जमीं है गाँव की..

आपसी संबंधों के चौंतरों पर बैठ कर
थे सभी चौडे बहुत ही रौब से कुछ ऐंठ कर
था नही पैसा बहुत और न अधिक सामान था
पर मेरे उस गाँव में सबका बहुत सम्मान था
माँग कर कपडे बने बारातियों के ताव की..
कि यह जमीं है गाँव की, हाँ ये जमीं है गाँव की..

कविता: योगेश समदर्शी

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

गावँ से शहर

गावँ से शहर 


नदिया के तीरे ,पर्वत की छाँव,
घाटी के आँचल मे मेरा वो गाँव,
बस्ती वहां एक भोली भाली,
उसमे घर एक ख़ाली ख़ाली,
बचपन बीता नदी किनारे,
पेड़ों के नीचे खेले खिलौने,
कुछ पेड़ कटे ,कुछ नदियाँ सूखी,
विकास की गति वहां न पंहुंची।
  
छूट चला इस गाँव से नाता,
         धुंए शोर मे घिर गई काया,
         लोग शहर के बड़े अलबेले,
         गमलों मे पेड़ो को लगायें,
         बौने पेड़ बौन्साई कहलायें,
          पर्वत से गिरते झरनों को,
घर मे लाकर वो सजायें,
         पशु पक्षी पलें पिजरों मे,
          इतवार को चिड़िया घर जायें।
बिनसर



रविवार, 21 जुलाई 2013

हम मांसाहारी नहीं हैं


हम मांसाहारी नहीं हैं 

हाँ भाई, हम मांसाहारी नहीं हैं, मुर्गा नहीं चबा पाते हैं.
लाशों को गटककर पेट कब्रिस्तान नहीं बना पाते हैं.
कभी जिन के साथ खेले थे, जिनको यार कहा कभी,
उन बेजुबा जानवरों को हँसते हँसते नहीं पचा पाते हैं.

मन भटक भी जाएँ अगर कभी, तो उसके चहकते भागते
बच्चों का सोच जाते हैं,
फिर छुर्री क्या, उसपे नज़र भी नहीं उठा पाते हैं.
हाँ भाई , हम मांसाहारी नहीं हैं, मुर्गा नहीं चबा पाते हैं.
चंद सिक्कों की खातिर, किसी का खून नहीं बहा पाते हैं.

आप महंगाई की बात कर रहे जनाब, ज़रा मैन्यू उठाइए, एक
टँगड़ी कबाब के पैसो में, दो जने भरपेट पनीर खा जाते हैं.
बाकी अब इसे देश का दुर्भाग्य कहूँ या उन
चूज़ो का कि एक अंडे की कीमत में मूट्ठी भर मटर नहीं आ
पाते हैं,

अब क्या करें, ये संस्कार हैं मिले हमें, भूखे रह जाएँ भले,
जिंदगी शुरू होने से पहले ही उन्हे मौत की नींद
नहीं सुला पाते हैं.
हाँ भाई, हम मांसाहारी नहीं हैं, मुर्गा नहीं चबा पाते हैं.
अपने पेट के वास्ते, किसी और का पेट नहीं कटा पाते हैं.

गाय को राष्ट्रीय पशु बनाएं

गाय को रास्ट्रीय पशु बनायें 

गाय हूँ, मैं गाय हूँ, इक लुप्त-सा अध्याय हूँ।
लोग कहते माँ मुझे पर मैं बड़ी असहाय हूँ।।

दूध मेरा पी रहे सब, और ताकत पा रहे।
पर हैं कुछ पापी यहाँ जो, माँस मेरा खा रहे।
देश कैसा है जहाँ, हर पल ही गैया कट रही।
रो रही धरती हमारी, उसकी छाती फट रही।

शर्म हमको अब नहीं है, गाय-वध के जश्न पर,
मुर्दनी छाई हुई है, गाय के इस प्रश्न पर।
मुझको बस जूठन खिला कर, पुन्य जोड़ा जा रहा,
जिं़दगी में झूठ का, परिधान ओढ़ा जा रहा।

कहने को हिंदू हैं लेकिन, गाय को नित मारते।
चंद पैसों के लिये, ईमान अपना हारते।
चाहिए सब को कमाई, बन गई दुनिया कसाई।
माँस मेरा बिक रहा मैं, डॉलरों की आय हूँ।। गाय हूँ....

मेरे तन में देवताओं का, सुना था वास है।
पर मुझे लगता है अब तो, बात यह बकवास है।
कैसे हैं वे देव जो, कटते यहाँ दिन-रात अब,
झूठ कहना बंद हो, पचती नहीं यह बात अब।

मर गई है चेतना, इस दौर को धिक्कार है।
आदमी को क्या हुआ, फितरत से शाकाहार है।
ओ कन्हैया आ भी जाओ, गाय तेरी रो रही।
कंस के वंशज बढ़े हैं, पाप उनके ढो रही।

जानवर घबरा रहे हैं, हर घड़ी इनसान से।
स्वाद के मारे हुए, पशुतुल्य हर नादान से।
खून मेरा मत बहाओ, दूध मेरा मत लजाओ।
बिन यशोदा माँ के अब तो, भोगती अन्याय हूँ।। गाय हूँ...

मैं भटकती दर-ब-दर, चारा नहीं, कचरा मिले,
कामधेनु को यहाँ बस, जहर ही पसरा मिले।
जहर खा कर दूध देती, विश्वमाता हूँ तभी,
है यही इच्छा रहे, तंदरुस्त दुनिया में सभी।

पालते हैं लोग कुत्ते और बिल्ली चाव से,
रो रहा है मन मेरा, हर पल इसी अलगाव से।
डॉग से बदतर हुई है, गॉड की सूरत यहाँ,
सोच पश्चिम की बनी है इसलिए आफत यहाँ।

खो गया गोकुल हमारा, अब कहाँ वे ग्वाल हैं,
अब तो बस्ती में लुटेरे, पूतना के लाल हैं।
देश को अपने जगाएँ, गाँव को फौरन बचाएँ।
हो रही है नष्ट दुनिया, मैं धरा की हाय हूँ।। गाय हूँ